Thursday, 10 March 2016

कम्प्यूटर और इन्टरनेट (7415550111)

इन्टरनेट को मानवाधिकार बनाने का अर्थ
आज के दौर में विचारों के संप्रेषण का सबसे स्वतंत्र और द्रुतगामी माध्यम है इंटरनेट। संचार के लिहाज़ से देखा जाये तो इन्टरनेट हमारे समाज की समाज की एक बड़ी आवश्यकता के रूप में उभर रहा है। फिर चाहे वो करप्शन के खिलाफ आवाज उठाने का साधन रहा हो, कार्यपालिका में पारदर्शिता लाने की बात हो या फिर सामाजिक  क्रांति की, समय समय पर इन्टरनेट ने अपना रोल अदा करके यह साबित किया है की आने वाले समय में सूचना समाज की एक नई संकल्पना में इन्टरनेट का ही वर्चस्व रहेगा। 
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार इन्टरनेट सेवा से लोगों को वंचित करना और ऑनलाइन सूचनाओं के मुक्त प्रसार में बाधा पहुँचाना मानवाधिकारों के उल्लघंन की श्रेणी में माना जाएगा संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि फ़्रैंक ला रू ने ये रिपोर्ट विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रसार और संरक्षण के अधीन तैयार की है।
यानि हम कह सकते हैं कि इन्टरनेट आने वाले समय में संविधान सम्मत और मानवीय अधिकारों का एक प्रतिनिधि बन कर उभरेगा इसी कड़ी में फिनलैंड ने विश्व के सभी देशों के समक्ष एक उदहारण पेश करते हुए इन्टरनेट को मूलभूत कानूनी अधिकार में शामिल कर लिया। 1980 में यूनेस्को ने तीसरी दुनिया के देशों के संचार तंत्र और सूचना साम्रज्यवाद को समझने के लिए शीन मैकब्राइड की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गयी जिसने “मैनी वोइसस वन वर्ल्ड” के नाम से अपनी रिपोर्ट दी जिसमे कहा गया कि मौजूदा सूचना व्यवस्था विकसित और धनी देशोन्मुख है धनी देशों का सूचना तंत्र पर वर्चस्व है, जो इसका अपने हित में इस्तेमाल करते हैं। इस संतुलन को दूरकरने के लिए आयोग ने नई विश्व सूचना व्यवस्था की सिफारिश की इस रिपोर्ट को आये हुए दो दशक बीत चुके हैं लेकिन जमीनी हकीकत पर कोई खास बदलाव तब तक नहीं हुआ जब तक की इन्टरनेट ने लोगों के दरवाजे पर दस्तक नहीं दी। भारत में भी शुरुवाती दौर में कंप्यूटर और इन्टरनेट को एक हिचक के साथ स्वीकार किया गया लेकिन आज इन्टरनेट जिस तरह देश और दुनिया बदल रहा है कि अब इसके बगैर जीवन की कल्पना करना संभव नहीं पहले इंसान की मूलभूत आवयश्कता थी रोटी कपड़ा और मकान लेकिन अब इसमें इन्टरनेट को शामिल कर संयुक्त राष्ट्र ने एक प्रगतिशील कदम उठा कर इस धारणा को पुष्ट किया है कि मानवाधिकार एक गतिशील अवधारणा है 
जैसे जैसे दुनिया बदलेगी मानवाधिकारों का दायरा भी बढ़ेगा पर इसमें इन्टरनेट का शामिल होना इन्टरनेट की व्यापकता और इसकी शक्ति को दर्शाता है। जापान में आयी सुनामी के समय लोगों तक मदद पहुँचाना या इजिप्ट में हुए सत्ता परिवर्तन में इन्टरनेट ने अपनी  व्यापकता को सिद्ध तो किया है एक जनमाध्यम के रूप में अपनी पहचान को स्थापित किया है। इसके अनुसार देखें तो इन्टरनेट ही इकलौता माध्यम है जो रेडियो अखबार और टेलिविजन की तरह एकतरफा माध्यम न होकर बहुआयामी है। अन्य दूसरे माध्यमों के इतर यह उन देशों में भी कारगर है जहाँ संचार साधनों को पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं प्राप्त है। इस माध्यम में विचारों का प्रवाह रोकना या उन्हें प्रभावित करना उतना आसान नहीं होता। इससे स्वतंत्र विचारों का सम्प्रेषण अधिक आसानी से होता है। सिटीजन जर्नलिस्ट की अवधारणा को पुष्ट करने में इन्टरनेट का सबसे बड़ा योगदान है आप कुछ भी दुनिया के साथ बाँट सकते हैं बगैर किसी सेंसर के आपको अपनी बात जन जन तक पहुंचाने के लिए कोई इंतिजार नहीं करना है।
एक तरह से देखें तो इन्टरनेट ने जनमाध्यमों के परिद्रश्य को पूरी तरह से बदल दिया है।
अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार यूनियन यानि आईटीयू के आंकड़ों के अनुसार विश्व में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में पिछले चार वर्षों में 77 करोड़ का इजाफ़ा हुआ है। प्रतिदिन ट्विटर पर पांच करोड़ संदेश भेजे जा रहे हैं और फ़ेसबुक के सदस्यों की संख्या 40 करोड़ तक पहुंच गई है। मोबाइल ब्रॉडबैंड कनेक्शन की संख्या चार वर्ष पहले सात करोड़ थी और अब ये बढ़कर 67 करोड़ हो गई है। सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था विकास केंद्रित हुई है मैकिंसे के नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारत में इंटरनेट ने बीते पांच साल में जीडीपी की वृद्धि में पांच प्रतिशत का योगदान किया है, जबकि ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) की अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह दर औसतन तीन प्रतिशत रही है। 
इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि विकास की गति को बढ़ाने में इन्टरनेट की कितनी महतवपूर्ण भूमिका है। विकास के फल को समाज के अंतिम आदमी तक पहुंचाने के लिए व्वस्था का भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी होना जरूरी है और इस काम को तेज गति से करने में इन्टरनेट एक सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है वो चाहे अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल बिल पास करने के लिए चलाया जाने वाला अभियान हो या बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स की मदद से तेजी से आगे बढ़ी और फ़ैली। इन्टरनेट विरोध या असहमति दर्ज कराने के एक नए प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है अमेरिकी सरकार निरंकुश शासन वाले देशों में राजनीतिक विरोधियों को इंटरनेट की आज़ादी हासिल करने के लिए ढाई करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद दे रहा है। विकासशील देशों में भले ही इन्टरनेट अपने पैर तेजी से पसार रहा हो पर उसकी गति विकसित देशों के मुकाबले कम है आईटीयू के ही आंकड़ों के अनुसार विकसित देशों में हर तीसरा व्यक्ति इंटरनेट से जुड़ा है वहीं विकासशील देशों में पांच में से चार व्यक्ति अब भी इंटरनेट से दूर हैं। भारत जैसे देश में जहाँ आर्थिक असमानता ज्यादा है वहाँ डिजीटल डिवाइड की समस्या और ज्यादा  गंभीर हो जाती है लेकिन रोटी कपडा और मकान जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकता के साथ जुड़ने से अब इन्टरनेट सेवाओं का विस्तार भी दुनिया की सरकारों की प्राथमिकता में रहेगा और जैसे जैसे सरकारें अपनी जनता को एक बेहतर जीवन उपलब्ध करती जायेंगी इन्टरनेट का विस्तार अपने आप होता जाएगा, यह कहना ठीक नहीं होगा कि इससे एक दिन में देश या दुनिया की तस्वीर बदल जायेगी पर एक शुरुवात तो हो ही गयी है।



नितिन लकड़े
7415550111